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संदेश

प्रेमगीत

( जीवन संगिनी गीता के लिए) गहराती शाम में सब्जियों की टोकरी से चंद आलू और बरबट्टी अलगाती तुम| जल, हाँ अश्रुजल से धूंधलाई आँखों को सपनों के सोखते से सुखाने की कोशिश में, स्याह रंगत में घुलती सांझ को सुख की रंगीनियों से जगमगाने की कोशिश में रत मैं बरबट्टी तोड़ती और मन के भीतर की ऊष्म आर्द्रता,सिर झुकाए, आँखों में घोलती तुम, देख नहीं सकोगी अपनी आँखों के केसर घुले अश्रुजल को मेरे पास वो ताब नहीं या वो दर्पण नहीं कि तुम्हारी आँखो में केसर घुले आँसुओं की झलक परावर्तित कर सकूँ| छौंके प्याज के भुनाने की गंध पूरे घर को जलन के बावजूद सुवादू सुवास से भर रही थी| घर में केवल तुम और मैं बैठे थे तुम्हारी रसोई में|

शलभ श्रीराम सिंह की दो कविताएँ

शलभ श्रीराम सिंह के बारे में बाबा नागार्जुन का अभिमत है कि, "शलभ से हिन्दी कविता का एक नया गोत्र प्रारंभ होता है. उन्हें किसी मठ में शरण लेने की आवश्यकता नहीं है." शलभ श्रीराम सिंह की कविताओं को लेकर डॉ. रामकृपाल पांडेय का कहना है कि, " प्यार का जितना सूक्ष्म, व्यापक, स्वस्थ और अकुंठ चित्रण शलभ ने किया है, सात्ोत्तरी कवियों में शायद किसी अन्य ने किया हो." उस दिन ईख की सूखी पत्ती का एक टुकड़ा था बालों में पीछे की तरफ. ज़रूरत से ज़्यादह बढ़ गई थी गालो की लाली. आईने में अपने चेहरे की सहजता सहेज रही थीं तुम खड़ी-खड़ी. सब कुछ देकर चली आईं थीं किसी को चुपचाप. सब कुछ देकर सब कुछ पाने का सुख था तुम्हारे चेहरे पर उस दिन उस दिन तुमको खुद से शरमाते हुए देख रहा था आईना. तुम्हारा शरीर है यह यह तुम्हारा शरीर है मेरे शरीर में समाता हुआ आता हुआ आईने के सामने प्यार का मतलब बताता हुआ पूरे यकीन के साथ. यह तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में बदलता हुआ निकलता हुआ आस्तीन से बाहर चलता हुआ भूख और प्यास के खिलाफ़ यह तुम्हारी आँख है मेरी आँख में ढलती हुई मचलती हुई देखने को पूरी दुनिया संभलती हुई किसी ...

आधे चाँद की रात

जब कभी कहानियों में अपनी बेचैनी को शांत नहीं कर पाता तो कविताएँ लिखने बैठ जाता हूँ. ऐसी ही मनोदशा में लिखी हुई एक कविता प्रस्तुत- आधे चाँद की रात अधकटे सेब की भभकती गंध की तरह तुम्हारी महक की बातें करता अधबने मकानों के बीच तलाशता तुम्हारी छवि को बनाते-टूटते-बिखरते रंग और रेखाओं को गहरी स्याही में घोलता जाता, देर तक डूबती अधूरे सांझ की गहरी खाई में. अधकटे खेतों के विस्तार में- अधपकी फसलों को तेज घाम,पकाने को आतुर ओसकणों से झुके पौधों को झुलसाता जाता है- अपने तेज से. वैसे ही पकना चाहा था- दहकते अंगारों में अपने सपनों को बारिस-जल ने गला दिया आधे पके हिस्से जो गले न थे पानी की बौछार से आधे चाँद की रात में आधा कटा पहाड़ इस पहाड़ की आधी कटी विशाल दैत्याकार छाया घेरती जाती है, आधी बन पाई स्मृतियों को.

श्याम अविनाश की कहानी- बेसिन

श्याम अविनाश की कविताओं के बाद उनकी एक कहानी प्रस्तुत है. कहानी छोटी होने के बावजूद मानवीय जिजीविषा का व्यापक और गहन आख्यान है. बेसिन पति-पत्नी वहाँ पहुँचे तो दिन ढल गया था. बदली वाली शाम थी. शहर की एक सूनी गली में स्थित थी वह धर्मशाला. धर्मशाला अधेड़ थी और काफ़ी बड़ी. एक संवलाई सफेदी उसके बरामदों में जमी थी. रंग- रोगन छोड़ शाम जैसे सदा के लिए वहाँ वैधव्य काट रही हो. उन्हें पहली मंज़िल पर कोने का कमरा मिला. पति अरसे बीमार था. इलाज के लिए ही वे यहाँ आए थे. पहली दफे में वह पति तथा एक थैले को उपर ले आई. दूसरे फेरे में छोटा-सा बिस्तरबंद तथा अटैची. पति काफ़ी थका तथा हताश था. वह कमरे में तख्त पर बैठ गया. कोने में झाड़ू रखी थी. उसने पति तथा सामान को बाहर निकाल, झाड़ू लगाई. फिर तख्त पर व्होटी दरी और चादर बिछा, तकिया रख दिया. पति लेट गया. कमरे में पीछे का दरवाजा बंद था. उस पार क्या है- उसने सीटकनी खोली. पीछे एक बहुत कम इस्तेमाल होने वाला बरामदा था. बरामदे में एक ओर बेसिन लगा था. बेसिन के पास गई. बेसिन काफ़ी गंद था. अरसे से उसे साफ नहीं किया गया था. काले-काले छ...
श्याम अविनाश की दो कविताएँ (श्याम अविनाश मेरे प्रिय कवियों में से हैं. शोर शराबे से दूर प. बंगाल के छोटे से जिले पुरुलिया में तपस्वी की तरह कविता और कहानी के सृजन में दशकों से शांत भाव से लीन हैं. श्याम अविनाश जी के सृजन-परिधि में वर्गीय चेतनता से सम्प्रिक्त-जीवन का कोलाज कैलाइडोस्कोपिक रूप से बनता रहता है. ) बस्ती की लड़की एक कहानी में वह आई थी मैनें बस्ती में मिली एक लड़की से ज़रा-सी मिट्टी निकल उसे बनाया था वह बड़ी उदास बनी थी जिस मर्द से उसका सांगा हुआ पाँच बच्चे उसके पहले से थे दर्द में डूबा रहा जीवन वह मार भी गई थी कहानी में अजीब दुख भरी मौत पर दूसरे दिन ही कहानी की वह लड़की आई और कहा क्या नहीं दे सकते मुझे दूसरा जीवन क्या जवाबदेता मैं कहानी के किरदार बीच बीच में आकर करते ही हैं परेशान लेकिन वह मानी नहीं, बार-बार आकर मांगती रही दूसरा जीवन् तंग आ मैने कहानी बदल दी वह बिल्कुल दूसरी सी हो गई कहानी भी हो गई साया और तब एक दिन बस्ती की वह लड़की आई जिसकी मिट्टी निकल मैंने बनाई थी कहानी की लड़की चुप बैठी रही कई देर, फिर बोली उसका जीवन तो बदल दिया पर इसमें क्या रक्खा है मेरा बादलो तब ...
(अनिरूद्ध नीरव नवगीत में एक सुपरिचित नाम है. इनके गीतों में प्रकृति और जीवन के सौन्दर्य का अनूठा स्थापत्य दिखाई देता है. उनके दो और नवगीत, उनके संग्रह "उड़ने की मुद्रा में" से प्रस्तुत है) कोई जलसा सारा जंगल कपड़े बदल रहा है कोई जलसा हफ्तों से चल रहा है इनके कपड़े वसंत ने सिले हैं शेड्स रंगों के सूर्य से मिले हैं फिट कुछ इतने बदन बदन खिले हैं मैं भी पहनू ये मन मचल रहा है मैं भी बढ़िया हरी कमीज़ ला कर उसको पहना अपने को कुछ लगा कर पेड़ देखे हँसने लगे ठठा कर कोई नकली असली में खल रहा है तब मैं जाना सुना भी था बड़ों से ये हरियाली मिलती न टेलरों से कोई रस है आता है जो जड़ों से मेरे नीचे मार्बल फिसल रहा है पिछला घर होता है अंतत: विदा घर से वह पिछला घर शीतल आशीष भरा एक कुआँ छोड़ कर चाह तो यही थी वह जाए पर उसका कोई हिस्सा ठहरे कुछ दिन चुने की परतों में बाबा माँ बाप रहें बच्चे लिखते रहें ककहरे कुछ दिन लेकिन वह समझ गया वक्त की नज़ाकत को सिमटा फिर हाथ पाँव मोड़कर चली कुछ दिनों तक पिछले घर की अगली यात्रा की तैयारी पुरज...