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मुक्तिबोध के ९३ वी जयंती के अवसर पर विशेष लेख

मुक्तिबोध: कथाकार व्यक्तित्व् डॉ. नागेश्वर लाल श्रीकांत वर्मा ने मुक्तिबोध की कहानियों के सन्दर्भ में प्रश्न पूछा है – “ क्या मुक्तिबोध के साहित्य का, जो महज साहित्य न रहकर मनुष्यता का दस्तावेज हो गया है, मूल्यांकन करने की जरुरत रह गयी है ?” प्रश्न के ढंग से बिल्कुल स्पष्ट है कि जरुरत नहीं है . फिर भी मुक्तिबोध की कविता का तथा नयी कविता, सर्जन-प्रक्रिया और अन्य विषयों के सम्बन्ध में उनकी आलोचनात्मक टिप्पणियों का मूल्यांकन किया जाता रहा है . उनकी कहानियों के मूल्यांकन के सम्बन्ध में श्रीकांत वर्मा का रुख समझ में नहीं आता . प्रतीत होता है कि दो धारणाओं के कारण उनका यह रुख है . वे समझते हैं कि मुक्तिबोध कि कहानियों में कुछ ऐसा है जो अटपटा लग सकता है; यहाँ तक कि उनमें कहानी की कमी भी है . शायद इसी कारण वे अपनी दूसरी धारणा प्रकट करते हुए सावधान करते हैं कि ‘मुक्तिबोध के साहित्य को उनके ही साहित्य की कसौटी के रूप में देखा जाये’ क्योंकि ‘उसमें इतनी प्रचंडता है कि उसपर परखने पर अपने अन्य गुणों के लिए महत्वपूर्ण दूसरों का साहित्य निश्चय टुच्चा नजर आयेगा .’ इ...

ऐसी थी दोस्ती

दस वर्ष पूर्व डा. चन्द्रबली सिंह से डा. आशा शर्मा ने साम्य के डा. रामविलास शर्मा के विषेषांक हेतु यह साक्षात्कार लिया गया था। वह डा. शर्मा पर एकाग्र अंक हाल ही प्रकाषित हुआ,जिसमें वह साक्षात्कार प्रकाषित हुआ है। अंक आने के लगभग एक माह बाद डा. चन्द्रबली सिंह के दुःखद निधन का समाचार हिन्दी-जनता में निशब्द सा घुलता हुआ मिला। डा.चन्द्रबली सिंह को विनम्र श्रद्धांजलि स्वरूप भावयति में साक्षात्कार प्रस्तुत है। डा. चन्द्रबली सिंह -डा. आशा शर्मा काशी विष्वविद्यालय में आयोजित पुनष्चर्या पाठ्यक्रम में भाग लेने के दोरान मैंने डा.ॅ चन्द्रबली सिंह जी से मिलने का मन बना लिया था। मैंने कार्यक्रम के संचालक डा.ॅ अवधेश प्रधान जी से सिंह जी के घर का पता ले लिया। यूं भी बनारस मेरे लिए नई जगह भी। मैं 10 जून 2001, रविवार की छुट्टी में विष्वविद्यालय से रेल्वे स्टेशन पहुंची और वहां से रिक्शे से मलदहिया चैराहा। मैंने रिक्शे पर बैठे-बैठे ही कुछ सभ्य ज...

निराला के गीत

निराला माने वसंत का अग्रदूत, हिन्दी के महाकवि निराला की आज वसंत पंचमी के दिन जयंती के अवसर पर उनके कुछ वासन्ती गीत प्रस्तुत है: रँग गई पग-पग धन्य धरा,--- हुई जग जगमग मनोहरा । वर्ण गन्ध धर, मधु मरन्द भर, तरु-उर की अरुणिमा तरुणतर खुली रूप - कलियों में पर भर स्तर स्तर सुपरिसरा । गूँज उठा पिक-पावन पंचम खग-कुल-कलरव मृदुल मनोरम, सुख के भय काँपती प्रणय-क्लम वन श्री चारुतरा सखि, वसन्त आया सखि वसन्त आया । भरा हर्ष वन के मन, नवोत्कर्ष छाया । किसलय-वसना नव-वय-लतिका मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका, मधुप-वृन्द बन्दी-- पिक-स्वर नभ सरसाया । लता-मुकुल-हार-गंध-भार भर, बही पवन बंद मंद मंदतर, जागी नयनों में वन- यौवन की माया । आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे, केशर के केश कली के छुटे, स्वर्ण-शस्य-अंचल पृथ्वी का लहराया ।

आग चाहिए आग

ठंड की शाम की बारिश का एक लैंडस्केप काले-गहरीले बादलों की अंधेरी सैन्य टुकड़ी हवाओं के घोड़ों पर सवार, दसों-दिशाओं से घेर रही कमजोर सूर्य को ठंड के दिनों की एक शाम| वनबेला के उज्ज्वल छीटों से भरी पहाड़ी ढलान की हरी चादर साँवली झाीओं से लिपटती सिहर रही थरथाराती कंपन से आर्द्र ऊष्मा से आक्रांत अंधेरी सैन्य टुकड़ी ने शुरू काए दिया बुनना जल का जाल आकाश से पृथ्वी तक जल के तार बाँधती टुकड़ी का शोर भरने लगा पहाड़ी ढलान में| ढलान की हरी चादर झोपड़ियोंमें टहलते टहल बजाते, झुरमूटों में विचरते और घास भरे गीले मैदान में रेंगते जीवन पर, कसता जाता जल का जाल| जल-जाल बिच कसमसाते जीव जुगत में लगने लगे, अपने सामर्थ्य का करते हिसाब ओदे हो गये हैं आग के सारे स्रोत, अकस्मात ही जल-जाल ने घेर लिया सारा का सारा खलिहान झोपड़ियों के बीच में, एक झोपड़ी के भीतर काँपती सी बुढाई आवाज़- आग-आग चाहिए,थोड़ी-सी आग

A Ballad by Mitesh Mishra

Sometimes things happen so violently in the life that we are unable to control it, this ballad resides on of such incidence in my life.......... have a look how love seems LOVE IS......................INNOCENT In the redness of the morning, when the the cool wind blows, my eyes feel the freedom, while seeing her roam। She make my day, everyday, she fills my heart with happiness, for her my soul always pray, her wings are enchanting, just like a rainbow, on a little rainy day. She glows like an angel, she floats like a kite, she sings thousand songs, whenever she stays, she is so beautiful, that my eyes never stray, no one noticed her, but how did she knew, that i may. Is she a friend or she just play, but whatever she did, i just want to say, i like seeing her fly, Through out the day, but she's shy and she is kind, i m happy to see her everyday. she does'nt belongs to me neither you,i must say. Now I like to wake in the morning, i like smell of th...

घनानंद की एक कविता

’घनआनँद’ प्यारे कहा जिय जारत, छैल ह्वै फीकिऐ खौरन सों । करि प्रीति पतंग कौ रंग दिना दस, दीसि परै सब ठौरन सों ॥ ये औसर फागु कौ नीकौ फब्यौ, गिरधारीहिं लै कहूँ टौरन सों । मन चाहत है मिलि खेलन कों, तुम खेलत हौ मिलि औरन सों ॥

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता प्रस्तुत है.

अक्सर एक व्यथा अक्सर एक गन्ध मेरे पास से गुज़र जाती है, अक्सर एक नदी मेरे सामने भर जाती है, अक्सर एक नाव आकर तट से टकराती है, अक्सर एक लीक दूर पार से बुलाती है । मैं जहाँ होता हूँ वहीं पर बैठ जाता हूँ, अक्सर एक प्रतिमा धूल में बन जाती है । अक्सर चाँद जेब में पड़ा हुआ मिलता है, सूरज को गिलहरी पेड़ पर बैठी खाती है, अक्सर दुनिया मटर का दाना हो जाती है, एक हथेली पर पूरी बस जाती है । मैं जहाँ होता हूँ वहाँ से उठ जाता हूँ, अक्सर रात चींटी-सी रेंगती हुई आती है । अक्सर एक हँसी ठंडी हवा-सी चलती है, अक्सर एक दृष्टि कनटोप-सा लगाती है, अक्सर एक बात पर्वत-सी खड़ी होती है, अक्सर एक ख़ामोशी मुझे कपड़े पहनाती है । मैं जहाँ होता हूँ वहाँ से चल पड़ता हूँ, अक्सर एक व्यथा यात्रा बन जाती है ।